रायगढ़।
दीपावली पर रोशनी और खुशियों का त्योहार मनाने की तैयारी है, लेकिन रायगढ़ जिले में पटाखों का कारोबार लोगों की जान जोखिम में डालकर किया जा रहा है। शहर में आधिकारिक रूप से महज दो फर्मों के पास पटाखों के संग्रहण और बिक्री का लाइसेंस है, जबकि करीब 200 से अधिक छोटे-बड़े व्यापारी कथित तौर पर बिना वैध अनुमति के अपने घरों, दुकानों और गोदामों में पटाखों का भंडारण कर रहे हैं। घनी आबादी वाले इलाकों में पटाखों का संग्रहण और खुलेआम खरीद-बिक्री हो रही है। किराना दुकानों से लेकर खिलौने की दुकानों तक में बारूद का कारोबार चल रहा है। जिला प्रशासन के नियम और सुरक्षा संबंधी दिशा-निर्देश मानो केवल कागजों तक सीमित रह गए हैं।
रायगढ़ जिले में जिन दो फर्मों को करीब 2500 किलोग्राम बारूद से निर्मित पटाखों के संग्रहण और बिक्री की अनुमति मिली है, वे शहर के ही हैं। लेकिन खुदरा और चिल्लर बाजार की तस्वीर इससे बिल्कुल अलग है। बाजार में ऐसे सैकड़ों चेहरे सक्रिय हैं, जिनके पास पटाखों के संग्रहण और बिक्री की वैध अनुमति होने की जानकारी नहीं है। खरसिया का एक पूजा सामग्री विक्रेता खुदरा पटाखा कारोबार में सबसे आगे बताया जा रहा है। वहीं रायगढ़ शहर के कई इलाकों में भी बड़े स्तर पर पटाखों की अवैध बिक्री हो रही है। सवाल उठता है कि जब लाइसेंस महज दो फर्मों के पास हैं तो बाकी कारोबारियों तक हजारों किलो पटाखे पहुंच कैसे रहे हैं। जानकारी के अनुसार पुलिस दबिश तो से रही है पर असर का वहीं तक सीमित हो जाती है।
बोइरदादर से टीवी टावर तक, हर तरफ बारूद का बाजार
रायगढ़ शहर में अवैध पटाखा कारोबार का दायरा लगातार बढ़ता जा रहा है। बोइरदादर क्षेत्र में शहर के ही खिलौनों के बड़े और नामचीन व्यापारी द्वारा बड़े स्तर पर पटाखों की अवैध बिक्री किए जाने की जानकारी सामने आ रही है। संजय कॉम्प्लेक्स में एक किराना दुकान संचालक के यहां पिछले साल छापेमारी भी हुई थी, लेकिन इस बार भी कथित तौर पर पहले से सेटिंग कर बेखौफ कारोबार जारी है। टीवी टावर के सामने स्थित किराना कम मार्ट में सालभर और विशेष रूप से दीपावली के दौरान पटाखों की बिक्री की जा रही है।
चूड़ी गोदाम, इंदिरा नगर, सिंधी कॉलोनी और छातामुड़ा सहित शहर के कई इलाकों में भी अवैध रूप से पटाखों के कारोबार की शिकायतें हैं। शहर के भीतर एक कथित समाजसेवी के संरक्षण में भी यह कारोबार संचालित होने की बात सामने आ रही है। कोतरा रोड स्थित पटाखा गोदाम में भी धड़ल्ले से बिक्री जारी है। सवाल यह है कि क्या इन सभी ठिकानों की जानकारी प्रशासन और पुलिस को नहीं है, या फिर सब कुछ जानते हुए भी कार्रवाई से परहेज किया जा रहा है।
खरसिया में किसी के पास लाइसेंस नहीं, फिर भी जिले का सबसे बड़ा पटाखा बाजार!
अवैध पटाखा कारोबार की बात हो और खरसिया का जिक्र न हो, ऐसा संभव नहीं। यहां किसी भी व्यापारी के पास पटाखों के कारोबार का वैध लाइसेंस नहीं होने की जानकारी है, इसके बावजूद पूरे जिले में पटाखों की सबसे ज्यादा बिक्री और खपत खरसिया में होने की बात कही जा रही है। यहां धान और चावल के संग्रहण के लिए इस्तेमाल होने वाले गोदामों में भी दीपावली के आसपास करीब दो महीने के लिए लाखों रुपये किराया देकर पटाखों का भंडारण किए जाने का आरोप है।
सवाल बेहद गंभीर है कि जिन गोदामों में अनाज रखा जाना चाहिए, वहां अचानक पटाखों का जखीरा क्यों जमा होने लगता है? किसकी अनुमति से इन गोदामों में विस्फोटक सामग्री रखी जाती है। यहां से फिर जिले के अलग-अलग इलाकों में पटाखों की आपूर्ति शुरू हो जाती है। स्थानीय स्तर पर इस कारोबार की जानकारी होने के बावजूद अब तक कोई बड़ी कार्रवाई नहीं होना प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करता है।
खरसिया से रायगढ़ तक करोड़ों का माल, तीन करोड़ का पटाखा पहले ही पैक
पटाखा कारोबार से जुड़े लोगों के अनुसार इस पूरे नेटवर्क में अरबों रुपये तक का व्यापार होने का दावा किया जाता है। रायगढ़ शहर में अभी तक अधिकृत पटाखा स्टॉल भी पूरी तरह नहीं लगे हैं, लेकिन करीब तीन करोड़ रुपये का पटाखा माल पहले ही पैक होकर तैयार बताया जा रहा है। यह माल खरसिया से निकलकर रायगढ़ के खुदरा व्यापारियों तक पहुंचने की तैयारी में है।
नियमों के मुताबिक शहर के खुदरा व्यापारियों को निर्धारित प्रक्रिया और अधिकृत माध्यम से पटाखे खरीदने चाहिए, लेकिन खरसिया से माल मंगाने के पीछे बड़ा कारण मुनाफे का खेल बताया जा रहा है। पटाखों के कारोबार में मार्जिन अधिक है और अवैध तरीके से खरीद-बिक्री करने पर नियमों और टैक्स संबंधी जवाबदेही से बचने की गुंजाइश बनती है। चंद रुपये के अतिरिक्त मुनाफे के लालच में व्यापारी आम लोगों की सुरक्षा को दांव पर लगा रहे हैं।
स्टॉल खुलने का इंतजार, उससे पहले ही घरों और दुकानों में पहुंच गया बारूद
दीपावली से कुछ दिन पहले जिला प्रशासन निर्धारित स्थानों पर तय मानकों और दिशा-निर्देशों के तहत अस्थायी पटाखा दुकानों को लाइसेंस देता है। इन दुकानों में सुरक्षा व्यवस्था, दूरी, भंडारण और अग्निशमन संबंधी मानकों का पालन अनिवार्य होता है। लेकिन विडंबना यह है कि अधिकृत स्टॉल खुलने से दो-तीन दिन पहले ही शहर और ग्रामीण क्षेत्रों में पटाखों की धड़ाधड़ बिक्री शुरू हो जाती है। घरों, किराना दुकानों और दूसरे व्यावसायिक प्रतिष्ठानों में पटाखों का संग्रहण और वितरण होता रहता है।
जब प्रशासन खुद अस्थायी दुकानों के लिए स्थान और सुरक्षा मानक तय करता है तो फिर घनी आबादी के बीच पटाखों का भंडारण और बिक्री कैसे हो रही है। क्या बिना लाइसेंस कारोबार करने वालों के लिए कोई अलग कानून है।
एक चिंगारी और तबाही, जिम्मेदार कौन?
पटाखों का कारोबार सामान्य किराना या पूजा सामग्री की बिक्री जैसा नहीं है। यह विस्फोटक सामग्री है, जिसके संग्रहण और बिक्री के लिए सख्त कानूनी प्रावधान और सुरक्षा मानक निर्धारित हैं। घनी बस्तियों में घरों, दुकानों और गोदामों में पटाखों का जखीरा जमा करना किसी भी वक्त बड़ी दुर्घटना का कारण बन सकता है। सुप्रीम कोर्ट के पटाखों से संबंधित निर्देशों और विस्फोटक सामग्री के भंडारण संबंधी नियमों के बीच भी आबादी वाले इलाकों में सुरक्षा की अनदेखी बेहद गंभीर सवाल है।
एक तरफ प्रशासन दीपावली के दौरान शांति, सुरक्षा और कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए बैठकें करता है, दूसरी तरफ शहर के भीतर बारूद का कारोबार बेखौफ चलता रहता है। यदि किसी घर, किराना दुकान या घनी बस्ती में स्थित गोदाम में आग लगती है तो इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा, क्या प्रशासन किसी बड़ी दुर्घटना के बाद ही जागेगा? दो लाइसेंस के मुकाबले 200 से अधिक अवैध कारोबारियों का यह कथित नेटवर्क केवल राजस्व और नियमों की चोरी नहीं, बल्कि हजारों लोगों की जिंदगी से खिलवाड़ है। अब देखना यह है कि जिला प्रशासन इस बार भी आंखें मूंदे रहता है या दीपावली से पहले बारूद के इस अवैध बाजार पर वास्तविक कार्रवाई करता है।

