रायगढ़। जब जिले के सांसद ही अपने अधिकार की लड़ाई नहीं लड़ पा रहे हैं, जिला मुख्यालय में एक अदद सरकारी आवास और कार्यालय तक नहीं बनवा पा रहे हैं, तो उनसे आम जनता की समस्या के समाधान की क्या उम्मीद की जा सकती है? यह सवाल अब रायगढ़ की सड़कों से लेकर सोशल मीडिया तक गूंज रहा है।
मामला तब उजागर हुआ जब आदिवासी नेता ने स्वयं कलेक्टर को पत्र लिखकर सांसदों के लिए आवास और कार्यालय की मांग की।
पत्र ने खोली पोल

अनुविभागीय अधिकारी लैलूंगा के माध्यम से कलेक्टर को भेजे गए पत्र में स्पष्ट लिखा है कि रायगढ़ के आदिवासी समाज से निर्वाचित लोकसभा सांसद राधेश्याम राठिया और राज्यसभा सांसद देवेंद्र प्रताप सिंह, तथा जिला पंचायत उपाध्यक्ष दीपक सिदार को आज तक जिला मुख्यालय में शासकीय आवास तक नहीं मिला है।
सोचने वाली बात है कि जो जनप्रतिनिधि शासन के नियमों के अनुसार अपना हक का आवास ही आबंटित नहीं करा पाए, वो दिल्ली और रायपुर में आदिवासी समाज के हक की क्या लड़ाई लड़ेंगे?
टिकट की तैयारी, काम जीरो?
चर्चा है कि भाजपा संगठन आगामी विधानसभा चुनाव में इन्हीं दोनों सांसदों को विधानसभा का टिकट देने की तैयारी कर रही है। ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि जब सांसद रहते हुए ही इनकी कार्यप्रणाली इतनी निष्क्रिय है, अपने अधिकार के प्रति इतने गैर-जागरूक हैं कि एक कार्यालय तक के लिए दूसरे को पत्र लिखना पड़ रहा है, तो विधायक बनने के बाद ये क्या सक्रियता दिखाएंगे?
स्थानीय लोगों का कहना है कि सांसद निधि, आदिवासी विकास, सड़क, पानी, स्वास्थ्य जैसे मुद्दों पर दोनों सांसदों की उपस्थिति नगण्य रही है। निष्क्रियता के आरोप अब खुलकर लग रहे हैं।
आदिवासी नेता की मांग से उजागर हुई हकीकत
आदिवासी समाज के नेता रवि भगत के द्वारा कलेक्टर से इन सांसदों के लिए आवास और कार्यालय की मांग करना ही इस बात का सबूत है कि उनकी निष्क्रियता किस हद तक खराब है। अपना काम तो छोड़िए, अपना सरकारी आवास तक ये स्वयं नहीं मांग पाए।
जनता पूछ रही है – क्या ऐसे निष्क्रिय नेतृत्व के भरोसे रायगढ़ के आदिवासी क्षेत्रों का विकास होगा? क्या भाजपा संगठन ऐसे नेताओं को विधानसभा में भेजकर आदिवासी समाज का भला कर पाएगी?
फिलहाल कलेक्टर कार्यालय में पत्र पहुंच चुका है, लेकिन इस पत्र ने सांसदों की कार्यशैली पर जो सवाल खड़ा किया है, उसका जवाब भाजपा संगठन को देना होगा।

